बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं
चौपाई २, दोहा ११९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥ २ ॥
अर्थ
विवश होकर (बिना इच्छा के) भी जिनका नाम लेने से मनुष्यों के अनेक जन्मों में किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [दुस्तर] समुद्र को गाय के खुर से बने हुए गड्ढे के समान (अर्थात् बिना किसी परिश्रम के) पार कर जाते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ११९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।
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शिव-पार्वती संवाद