जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका

चौपाई ३, दोहा ११५ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥ हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ

जिनको निर्गुण-सगुण का कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें कहा करते हैं, जो हरि-माया के वश में होकर जगत् में भ्रमते रहते हैं, उनके लिए ऐसा कहना कुछ भी अनुचित नहीं है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “शिव-पार्वती संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद पार्वती द्वारा राम के स्वरूप और अवतार-रहस्य के विषय में शिवजी से प्रेमपूर्ण संवाद का वर्णन है।

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शिव-पार्वती संवाद