युद्धारम्भ
वानर और राक्षस सेनाएँ आमने-सामने आती हैं और महासंग्राम आरंभ होता है। रणभूमि में पराक्रम, गर्जना और दिव्य उत्साह छा जाता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ११ / ३७
प्रकरण पाठ
सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥ उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥ ३ ॥
अर्थ:
और बोला-- हे वीरो! सब लोग चारों दिशाओं में जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। हे उमा! रावण को ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपर की ओर करके सोता है [मानो आकाश को थाम लेगा]।
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥ बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥ १ ॥
अर्थ:
वे परकोटे के कँगूरों पर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके बज रहे हैं, [जिनकी] ध्वनि सुनकर योद्धाओं के मन में [लड़ने का] चाव होता है।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥ ३ ॥
अर्थ:
वे दौड़ते हैं, ऊँची-नीची विकट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ों को फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतों से ओंठ काटते और खूब तर्जना करते हैं।
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥ ४ ॥
अर्थ:
उधर रावण और इधर श्रीराम की दोहाई है। जय-जय की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी। राक्षस पहाड़ों के ढेर-के-ढेर शिखरों को फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और फिर उन्हीं की ओर चलाते हैं।
धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥ अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥
अर्थ:
प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चंचल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्ती से उछलकर किले पर चढ़-चढ़कर गये और जहाँ-तहाँ महलों में घुसकर श्रीरामजी का यश गाने लगे॥।
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥ निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥ ३ ॥
अर्थ:
सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया। रावण ने जब अपनी सेना का विचलित होना कानों से सुना, तब [भागते हुए] योद्धाओं को लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला--
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥ ४ ॥
अर्थ:
वे गर्जकर शत्रु की सेना के बीच में कूद पड़े और अपने भारी भुजबल से उसका मर्दन करने लगे। किसी को लात से और किसी को चपेट से खबर लेते हैं [और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजी को नहीं भजते, उसका यह फल लो।
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥ कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥ १ ॥
अर्थ:
जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों) को पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभु के पास ले चलाते हैं। विभीषणजी उनके नाम बताते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं।
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी। उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥ २ ॥
अर्थ:
ब्राह्मणों का मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह गति पाते हैं जिसकी याचना योगी करते हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! श्रीरामजी बड़े ही कोमलचित्त और करुणाकर हैं। [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैर भाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं।
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥ ३ ॥
अर्थ:
ऐसा हृदय में जानकर वे उन्हें परम गति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं? प्रभु का ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहु मारुत के प्रेरे॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया॥ ५ ॥
अर्थ:
(राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं) मानो क्रमशः वर्षा और शरद्-ऋतु के बहुत-से बादल पवन से प्रेरित होकर लड़ रहे हों। अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियों ने अपनी सेना के विचलित होते देखकर माया की।
भागत भट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
भागते हुए राक्षस योद्धाओं को वानर और भालू पकड़कर पृथ्वी पर दे मारते हैं। और अद्भुत करनी करते हैं (युद्धकौशल दिखलाते हैं)। पैर पकड़कर उन्हें समुद्र में डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मछलियाँ पकड़-पकड़कर खा डालती हैं।