युद्धारम्भ

वानर और राक्षस सेनाएँ आमने-सामने आती हैं और महासंग्राम आरंभ होता है। रणभूमि में पराक्रम, गर्जना और दिव्य उत्साह छा जाता है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ११ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी॥ देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई॥ १ ॥

अर्थ:

लंका में बड़ा भारी कोलाहल (कोहराम) मच गया। अत्यन्त अहंकारी रावण ने उसे सुनकर कहा-- वानरों की ढिठाई तो देखो! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसों की सेना बुलायी।

चौपाई

आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे॥ अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा। गृह बैठें अहार बिधि दीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

बंदर काल की प्रेरणा से चले आये हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विधाता ने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्ख ने अट्टहास किया (वह बड़े जोर से ठहाका मारकर हँसा)।

चौपाई

सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥ उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना॥ ३ ॥

अर्थ:

और बोला-- हे वीरो! सब लोग चारों दिशाओं में जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। हे उमा! रावण को ऐसा अभिमान था जैसे टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपर की ओर करके सोता है [मानो आकाश को थाम लेगा]।

चौपाई

चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥ तोमर मुद्गर परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरिखंडा॥ ४ ॥

अर्थ:

आज्ञा माँगकर राक्षस चले, और हाथों में उत्तम भिंदिपाल, साँगी (बरछी) लिए। तोमर, मुद्गर, प्रचण्ड फरसे, शूल, कृपाण, परिघ और गिरिखण्डा भी थे।

चौपाई

जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥ चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥ ५ ॥

अर्थ:

जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरों का समूह देखकर उस पर टूट पड़ते हैं, [पत्थरों पर लगने से] चोंच टूटने का दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े।

दोहा

नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर। कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥ ४० ॥

अर्थ:

अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किये करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटे के कँगूरों पर चढ़ गये।

दोहा 41 के अंतर्गत
चौपाई

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥ बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥ १ ॥

अर्थ:

वे परकोटे के कँगूरों पर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके बज रहे हैं, [जिनकी] ध्वनि सुनकर योद्धाओं के मन में [लड़ने का] चाव होता है।

चौपाई

बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥ देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा॥ २ ॥

अर्थ:

अगणित नफीरी और भेरी बज रही हैं, [जिन्हें] सुनकर कायरों के हृदय में दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीरवाले महान् योद्धा वानर और भालुओं के ठट्टे देखे।

चौपाई

धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

वे दौड़ते हैं, ऊँची-नीची विकट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ों को फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतों से ओंठ काटते और खूब तर्जना करते हैं।

चौपाई

उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥ ४ ॥

अर्थ:

उधर रावण और इधर श्रीराम की दोहाई है। जय-जय की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गयी। राक्षस पहाड़ों के ढेर-के-ढेर शिखरों को फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और फिर उन्हीं की ओर चलाते हैं।

छन्द

धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥ अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥

अर्थ:

प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चंचल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्ती से उछलकर किले पर चढ़-चढ़कर गये और जहाँ-तहाँ महलों में घुसकर श्रीरामजी का यश गाने लगे॥।

दोहा

एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ। ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥ ४१ ॥

अर्थ:

फिर एक-एक राक्षस को पकड़कर वे वानर भाग चले। ऊपर आप, नीचे भट—इस प्रकार वे धरती पर आ गिरते हैं।

दोहा 42 के अंतर्गत
चौपाई

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥ चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के प्रताप से प्रबल वानरों के झुंड राक्षस योद्धाओं के समूहों को मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किले पर चढ़ गये और प्रताप में सूर्य के समान श्रीरघुबीर की जय बोलने लगे।

चौपाई

चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥ हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥ २ ॥

अर्थ:

राक्षसों के झुंड वैसे ही भाग चले जैसे जोर की हवा चलने पर बादलों के समूह तितर-बितर हो जाते हैं। लंका नगरी में बड़ा भारी हाहाकार मच गया। बालक, स्त्रियाँ और रोगी [असमर्थता के कारण] रोने लगे।

चौपाई

सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥ निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥ ३ ॥

अर्थ:

सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया। रावण ने जब अपनी सेना का विचलित होना कानों से सुना, तब [भागते हुए] योद्धाओं को लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला--

चौपाई

जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥ सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं जिसे रण से पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुनूँगा, उसे स्वयं भयानक कृपाण से मारूँगा। मेरा सब कुछ खाया, भाँति-भाँति के भोग किये और अब रणभूमि में प्राण प्यारे हो गये।

चौपाई

उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥ सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा॥ ५ ॥

अर्थ:

रावण के उग्र वचन सुनकर सब डर गये और लज्जित होकर क्रोध में युद्ध के लिये लौट चले। सम्मुख मरने में ही वीर की शोभा है। तब उन्होंने प्राणों का लोभ छोड़ दिया।

दोहा

बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि। ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि॥ ४२ ॥

अर्थ:

बहुत-से अस्त्र-शस्त्र धारण किये सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। परिघों और त्रिशूलों से मार-मारकर उन्होंने सब रीछ-वानरों को व्याकुल कर दिया।

दोहा 43 के अंतर्गत
चौपाई

भय आतुर कपि भागन लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥ कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥ १ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं-- ] वानर भयातुर होकर (डर के मारे घबड़ाकर) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर [वे ही] जीतेंगे। कोई कहता है-- अंगद-हनुमान् कहाँ हैं? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?

चौपाई

निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥ मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥ २ ॥

अर्थ:

हनुमानजी ने जब अपने दल को विकल (भयभीत) हुआ सुना, उस समय वे बलवान पश्चिम द्वार पर थे। वहाँ मेघनाद उनसे युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी।

चौपाई

पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥ कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब पवनपुत्र हनुमानजी के मन में बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे काल के समान योद्धा बड़े जोर से गरजे और कूदकर लंका गढ़ पर आ गये और पहाड़ लेकर मेघनाद की ओर दौड़े।

चौपाई

भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता॥ दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥ ४ ॥

अर्थ:

रथ तोड़ डाला, सारथी को मार गिराया और मेघनाद की छाती में लात मारी। दूसरा सारथि मेघनाद को व्याकुल जानकर, उसे रथ में डालकर, तुरंत घर ले आया।

दोहा

अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल। रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥ ४३ ॥

अर्थ:

इधर अंगद ने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किले पर अकेले ही गये हैं, तो रण में बाँकुरे बालिसुत वानर के खेल की तरह उछलकर किले पर चढ़ गये।

दोहा 44 के अंतर्गत
चौपाई

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई॥ १ ॥

अर्थ:

युद्ध में शत्रुओं के विरुद्ध दोनों वानर क्रुद्ध हो गये। हृदय में श्रीरामजी के प्रताप का स्मरण करके दोनों दौड़कर रावण के महल पर जा चढ़े और कोसलाधीश की दुहाई बोलने लगे।

चौपाई

कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥ नारि बृंद कर पीटहिं छाती। अब दुइ कपि आए उतपाती॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने कलश सहित भवन को पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षसराज रावण डर गया। नारियों के समूह छाती पीटने लगे [और कहने लगे--] अब दो उत्पाती वानर [एक साथ] आ गये।

चौपाई

कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥ पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥ ३ ॥

अर्थ:

वानरलीला करके (घुड़की देकर) दोनों उनको डराते हैं और श्रीरामचन्द्रजी का सुयश सुनाते हैं। फिर हाथों से सोने के खंभे पकड़कर उन्होंने [परस्पर] कहा कि अब उत्पात आरम्भ किया जाय।

चौपाई

गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मर्दै भुज बल भारी॥ काहुहि लात चपेटन्हि केहू। भजहु न रामहि सो फल लेहू॥ ४ ॥

अर्थ:

वे गर्जकर शत्रु की सेना के बीच में कूद पड़े और अपने भारी भुजबल से उसका मर्दन करने लगे। किसी को लात से और किसी को चपेट से खबर लेते हैं [और कहते हैं कि] तुम श्रीरामजी को नहीं भजते, उसका यह फल लो।

दोहा

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥ ४४ ॥

अर्थ:

एक को दूसरे से [रगड़कर] मसल डालते हैं और सिरों को तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावण के सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं मानो दही के कूँड़े फूट रहे हों।

दोहा 45 के अंतर्गत
चौपाई

महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं॥ कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥ १ ॥

अर्थ:

जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों) को पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभु के पास ले चलाते हैं। विभीषणजी उनके नाम बताते हैं और श्रीरामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं।

चौपाई

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी। उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥ २ ॥

अर्थ:

ब्राह्मणों का मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह गति पाते हैं जिसकी याचना योगी करते हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! श्रीरामजी बड़े ही कोमलचित्त और करुणाकर हैं। [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैर भाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं।

चौपाई

देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहहु भवानी॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥ ३ ॥

अर्थ:

ऐसा हृदय में जानकर वे उन्हें परम गति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु [और] कौन हैं? प्रभु का ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्यागकर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यन्त मन्दबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं।

चौपाई

अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥ लंका द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने कहा कि अंगद और हनुमान किले में घुस गये हैं। दोनों वानर लंका में [विध्वंस करते] कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्र को मथ रहे हों।

दोहा

भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत। कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत॥ ४५ ॥

अर्थ:

भुजाओं के बल से शत्रु-दल को दलमलि करके और दिन के अन्त को देखकर, दोनों कूद पड़े; वे श्रमरहित होकर वहाँ आ गये जहाँ भगवान् थे।

दोहा 46 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए॥ राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे॥ १ ॥

अर्थ:

उन्होंने प्रभु के चरणकमलों में सिर नवाये। उत्तम योद्धाओं को देखकर रघुपति मन में प्रसन्न हुए। श्रीरामजी ने कृपा करके दोनों को देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गये।

चौपाई

गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना॥ जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई॥ २ ॥

अर्थ:

अंगद और हनुमान को गये जानकर भालू और अनेक वानर वीर लौट पड़े। राक्षसों ने प्रदोष काल का बल पाकर रावण की दुहाई देते हुए धावा किया।

चौपाई

निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी॥ ३ ॥

अर्थ:

राक्षसों की सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गये। दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं। योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानता।

चौपाई

महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे॥ सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा॥ ४ ॥

अर्थ:

सभी राक्षस महान् वीर और अत्यन्त काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगों के हैं। दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बलवाले योद्धा हैं। वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) हैं।

चौपाई

प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहु मारुत के प्रेरे॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया॥ ५ ॥

अर्थ:

(राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं) मानो क्रमशः वर्षा और शरद्-ऋतु के बहुत-से बादल पवन से प्रेरित होकर लड़ रहे हों। अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियों ने अपनी सेना के विचलित होते देखकर माया की।

चौपाई

भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा॥ ६ ॥

अर्थ:

पलभर में अत्यन्त अन्धकार हो गया। खून, पत्थर और राख की वर्षा होने लगी।

दोहा

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार। एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥ ४६ ॥

अर्थ:

दसों दिशाओं में अत्यन्त घना अन्धकार देखकर वानरों की सेना में खलबली पड़ गयी। एक को एक नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार कर रहे हैं।

दोहा 47 के अंतर्गत
चौपाई

सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥ समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी सब रहस्य जान गये। उन्होंने अंगद और हनुमान को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया। सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े।

चौपाई

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥ २ ॥

अर्थ:

फिर कृपालु श्रीरामजी ने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञान के उदय होने पर [सब प्रकार के] संदेह दूर हो जाते हैं।

चौपाई

भालु बलीमुख पाइ प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥ हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥ ३ ॥

अर्थ:

भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भय से रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान् और अंगद रण में गरज उठे। उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे।

चौपाई

भागत भट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

भागते हुए राक्षस योद्धाओं को वानर और भालू पकड़कर पृथ्वी पर दे मारते हैं। और अद्भुत करनी करते हैं (युद्धकौशल दिखलाते हैं)। पैर पकड़कर उन्हें समुद्र में डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मछलियाँ पकड़-पकड़कर खा डालती हैं।

दोहा

कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥ ४७ ॥

अर्थ:

कुछ मारे गये, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़ पर चढ़ गये। अपने बल से शत्रु दल को विचलित करके रीछ और वानर [वीर] गरज रहे हैं।