धावहिं गनहिं न अवघट घाटा

चौपाई ३, दोहा ४१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥ ३ ॥

अर्थ

वे दौड़ते हैं, ऊँची-नीची विकट घाटियों को कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ों को फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतों से ओंठ काटते और खूब तर्जना करते हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “युद्धारम्भ” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वानर और राक्षस सेनाओं के बीच लंका के महासंग्राम के आरंभ का वर्णन है।

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युद्धारम्भ