धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु

छन्द, दोहा ४१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥ अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए॥

अर्थ

प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चंचल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्ती से उछलकर किले पर चढ़-चढ़कर गये और जहाँ-तहाँ महलों में घुसकर श्रीरामजी का यश गाने लगे॥।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “युद्धारम्भ” प्रकरण का छन्द, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वानर और राक्षस सेनाओं के बीच लंका के महासंग्राम के आरंभ का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
युद्धारम्भ