अंगद-राम-संवाद
लंका से लौटकर अंगदजी श्रीरामजी को वहाँ की स्थिति सुनाते हैं। उनके बीच रावण की हठ और आगे की युद्धनीति पर संवाद होता है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १० / ३७
प्रकरण पाठ
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन॥ करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा॥ २ ॥
अर्थ:
तब वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवानु और विभीषण ने हृदय में सूर्यकुल के भूषण श्रीरघुनाथजी का स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरों की सेना के चार दल बनाये।
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहिं भेरी॥ ५ ॥
अर्थ:
लंका को अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से निडर होकर चले। चारों ओर से घिरी हुई बादलों की घटा की तरह लंका को चारों दिशाओं से घेरकर वे मुँह से ही डंके और भेरी बजाने लगे।