पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा
चौपाई २, दोहा ४७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥ भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥ २ ॥
अर्थ
फिर कृपालु श्रीरामजी ने हँसकर धनुष चढ़ाया और तुरंत ही अग्निबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञान के उदय होने पर [सब प्रकार के] संदेह दूर हो जाते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “युद्धारम्भ” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वानर और राक्षस सेनाओं के बीच लंका के महासंग्राम के आरंभ का वर्णन है।
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युद्धारम्भ