खल मनुजाद द्विजामिष भोगी

चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी। उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥ २ ॥

अर्थ

ब्राह्मणों का मांस खानेवाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह गति पाते हैं जिसकी याचना योगी करते हैं। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! श्रीरामजी बड़े ही कोमलचित्त और करुणाकर हैं। [वे सोचते हैं कि] राक्षस मुझे वैर भाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “युद्धारम्भ” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वानर और राक्षस सेनाओं के बीच लंका के महासंग्राम के आरंभ का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
युद्धारम्भ