कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे
चौपाई १, दोहा ४१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे॥ बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥ १ ॥
अर्थ
वे परकोटे के कँगूरों पर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके बज रहे हैं, [जिनकी] ध्वनि सुनकर योद्धाओं के मन में [लड़ने का] चाव होता है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “युद्धारम्भ” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वानर और राक्षस सेनाओं के बीच लंका के महासंग्राम के आरंभ का वर्णन है।
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युद्धारम्भ