माल्यवान का रावण को समझाना

वयोवृद्ध माल्यवान रावण को उचित परामर्श देते हुए संधि और विवेक का मार्ग सुझाते हैं। रावण फिर भी अपने दुराग्रह से पीछे नहीं हटता।

लंकाकाण्ड · प्रकरण १२ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥ राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥ १ ॥

अर्थ:

रात हुई जानकर वानरों की चारों सेनाएँ (टुकड़ियाँ) वहाँ आयीं जहाँ कोसलपति श्रीरामजी थे। श्रीरामजी ने ज्यों ही सब को कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गये।

चौपाई

उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥ आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहहु बेगि का करिअ बिचारा॥ २ ॥

अर्थ:

वहाँ [लंका में] रावण ने मन्त्रियों को बुलाया और जो योद्धा मारे गये थे उन सब को बतलाया। [उसने कहा--] वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार (उपाय) करना चाहिए?

चौपाई

माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥ बोला बचन नीति अति पावन। सुनहु तात कछु मोर सिखावन॥ ३ ॥

अर्थ:

माल्यवंत [नाम का एक] अत्यन्त बूढ़ा राक्षस था। वह रावण की माता का पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मन्त्री था। वह अत्यन्त पवित्र नीति के वचन बोला-हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो--।

चौपाई

जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥ बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहुँ न सुख पायो॥ ४ ॥

अर्थ:

जब से तुम सीता को हर लाये हो, तब से इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किये जा सकते। वेद-पुराणों ने जिन का यश गाया है, उन श्रीराम से विमुख होकर किसी ने सुख नहीं पाया।

दोहा

हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥ ४८ (क) ॥

अर्थ:

भाई हिरण्याक्ष सहित मधु-कैटभ को जिन्होंने मारा था, वे ही कृपासिंधु भगवान् [रामरूप से] अवतरित हुए हैं।

दोहा

कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥ ४८ (ख) ॥

अर्थ:

जो कालस्वरूप हैं, दुष्टों के समूहरूपी वन के भस्म करनेवाले [अग्नि] हैं, गुणों के धाम और ज्ञानघन हैं, एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे बैर कैसा ?

दोहा 49 के अंतर्गत
चौपाई

परिहरि बयरु देहु बैदेही। भजहु कृपानिधि परम सनेही॥ ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुह करि जाहि अभागे॥ १ ॥

अर्थ:

[अतः] वैर छोड़कर उन्हें जानकीजी को दे दो और कृपानिधान परम स्नेही श्रीरामजी का भजन करो। रावण को उसके वचन बाण के समान लगे। [वह बोला--] अरे अभागे! मुँह काला करके [यहाँ से] निकल जा।

चौपाई

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥ तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥ २ ॥

अर्थ:

तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखों को अपना मुँह न दिखला। रावण के ये वचन सुनकर उसने (माल्यवान ने) अपने मन में ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं।

चौपाई

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥ कौतुक प्रात देखिअहु मोरा। करिहउँ बहुत कहौं का थोरा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह रावण को दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला--सबेरे मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा; थोड़ा क्या कहूँ ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा)।

चौपाई

सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥ ४ ॥

अर्थ:

पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा आ गया। उसने प्रेम के साथ उसे अंक में बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजों पर जा लगे।

चौपाई

कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए॥ ५ ॥

अर्थ:

वानरों ने क्रोध करके दुर्गम किले को घेर लिया। नगर में बहुत ही कोलाहल (शोर) मच गया। राक्षस बहुत तरह के अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किले पर से पहाड़ों के शिखर ढहाये।

छन्द

ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए। गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥

अर्थ:

उन्होंने पर्वतों के करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकार से गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकाल के बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किले पर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ मारे जाते हैं।

दोहा

मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ। उतर्‌यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥ ४९ ॥

अर्थ:

मेघनाद ने कानों से ऐसा सुना कि वानरों ने आकर फिर किले को घेर लिया है। तब वह वीर किले से उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला।

दोहा 50 के अंतर्गत
चौपाई

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोक बिख्याता॥ कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥ १ ॥

अर्थ:

समस्त लोकों में प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं ? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बल की सीमा अंगद और हनुमान् कहाँ हैं ?

चौपाई

कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥ २ ॥

अर्थ:

भाई से द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सब को और उस दुष्ट को तो हठपूर्वक (अवश्य ही) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुष पर कठिन बाणों का सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कान तक खींचा।

चौपाई

सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥ जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥ ३ ॥

अर्थ:

वह बाणों के समूह छोड़ने लगा। मानो बहुत-से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखायी पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके।

चौपाई

जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥ ४ ॥

अर्थ:

रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सब को युद्ध की इच्छा भूल गयी। रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राण ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सब जाता न रहा हो)।

दोहा

दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥ ५० ॥

अर्थ:

फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वी पर गिर पड़े। बलवान् और धीर मेघनाद सिंह के समान नाद करके गरजने लगा।

दोहा 51 के अंतर्गत
चौपाई

देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥ १ ॥

अर्थ:

सारी सेना का बेहाल (व्याकुल) देखकर पवनसुत हनुमान्‌ क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ा आता हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोध के साथ उसे मेघनाद पर छोड़ा।

चौपाई

आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥ बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥ २ ॥

अर्थ:

पहाड़ को आते देखकर वह आकाश में उड़ गया। [उसके] रथ, सारथि और घोड़े सब नष्ट हो गये (चूर-चूर हो गये)। हनुमानजी उसे बार-बार ललकारते हैं। पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बल का मर्म जानता था।

चौपाई

रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥ ३ ॥

अर्थ:

[तब] मेघनाद श्रीरघुनाथजी के पास गया और उसने [उनके प्रति] अनेकों प्रकार के दुर्बचनों का प्रयोग किया। [फिर] उसने उन पर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये। प्रभु ने खेल में ही सब को काट कर अलग कर दिया।

चौपाई

देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी का प्रताप (सामर्थ्य) देखकर वह मूर्ख लज्जित हो गया और अनेकों प्रकार की माया करने लगा। जैसे कोई व्यक्ति छोटा-सा साँप का बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डरावे और उससे खेल करे।

दोहा

जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥ ५१ ॥

अर्थ:

शिवजी और ब्रह्माजी तक बड़े-छोटे [सभी] जिन की अत्यन्त बलवान माया के वश में हैं, नीचबुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है।

दोहा 52 के अंतर्गत
चौपाई

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥ १ ॥

अर्थ:

आकाश में [ऊँचे] चढ़कर वह बहुत-से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वी से जल की धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकार के पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर “मारो, काटो” की आवाज करने लगीं।

चौपाई

बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा॥ बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥ २ ॥

अर्थ:

वह कभी तो विष्ठा, पीब, खून, बाल और हड्डियाँ बरसाता था और कभी बहुत-से पत्थर फेंक देता था। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था।

चौपाई

कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना एहि लेखें॥ कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥ ३ ॥

अर्थ:

माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाब से (इसी तरह रहा) तो सब का मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्रीरामजी मुसकराये। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गये हैं।

चौपाई

एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥ ४ ॥

अर्थ:

तब श्रीरामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपादृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रण में रोकने पर भी नहीं रुकते थे।

दोहा

आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ॥ ५२ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी से आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरों के साथ हाथों में धनुष-बाण लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी क्रुद्ध होकर चले।

दोहा 53 के अंतर्गत
चौपाई

छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥ १ ॥

अर्थ:

उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वत के समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावण ने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े।

चौपाई

भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥ २ ॥

अर्थ:

पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर “श्रीरामचन्द्रजी की जय” पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जय की इच्छा कम न थी (अर्थात्‌ प्रबल थी)।

चौपाई

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥ ३ ॥

अर्थ:

वानर उन्हें घूँसों और लातों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। “मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो'।

चौपाई

असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा। कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा॥ ४ ॥

अर्थ:

नवों खण्डों में ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाश में देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी विस्मय होता है और कभी आनन्द।

दोहा

रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ॥ ५३ ॥

अर्थ:

खून गड्ढों में भर-भरकर जम गया है और उस पर धूल उड़कर पड़ रही है [वह दृश्य ऐसा है] मानो अंगारों के ढेरों पर राख छा रही हो।