माल्यवान का रावण को समझाना
वयोवृद्ध माल्यवान रावण को उचित परामर्श देते हुए संधि और विवेक का मार्ग सुझाते हैं। रावण फिर भी अपने दुराग्रह से पीछे नहीं हटता।
लंकाकाण्ड · प्रकरण १२ / ३७
प्रकरण पाठ
बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥ तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥ २ ॥
अर्थ:
तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखों को अपना मुँह न दिखला। रावण के ये वचन सुनकर उसने (माल्यवान ने) अपने मन में ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्रीरामजी अब मारना ही चाहते हैं।
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए। गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए॥
अर्थ:
उन्होंने पर्वतों के करोड़ों शिखर ढहाये, अनेक प्रकार से गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज्रपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं मानो प्रलयकाल के बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किले पर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ-के-तहाँ मारे जाते हैं।
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥ अस कहि कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥ २ ॥
अर्थ:
भाई से द्रोह करनेवाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सब को और उस दुष्ट को तो हठपूर्वक (अवश्य ही) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुष पर कठिन बाणों का सन्धान किया और अत्यन्त क्रोध करके उसे कान तक खींचा।
जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥ ४ ॥
अर्थ:
रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सब को युद्ध की इच्छा भूल गयी। रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखायी पड़ा जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राण ही न बचे हों; बल, पुरुषार्थ सब जाता न रहा हो)।
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥ ३ ॥
अर्थ:
[तब] मेघनाद श्रीरघुनाथजी के पास गया और उसने [उनके प्रति] अनेकों प्रकार के दुर्बचनों का प्रयोग किया। [फिर] उसने उन पर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाये। प्रभु ने खेल में ही सब को काट कर अलग कर दिया।
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥ ४ ॥
अर्थ:
तब श्रीरामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अन्धकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपादृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा, [जिससे] वे ऐसे प्रबल हो गये कि रण में रोकने पर भी नहीं रुकते थे।
छतज नयन उर बाहु बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥ १ ॥
अर्थ:
उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वत के समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिये हुए है। इधर रावण ने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े।
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥ २ ॥
अर्थ:
पर्वत, नख और वृक्षरूपी हथियार धारण किये हुए वानर “श्रीरामचन्द्रजी की जय” पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गये। इधर और उधर दोनों ओर जय की इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी)।
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥ ३ ॥
अर्थ:
वानर उन्हें घूँसों और लातों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। “मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो'।