राउरि रीति सुबानि बड़ाई
राउरि रीति सुबानि बड़ाई
चौपाई १, दोहा २९९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई॥ कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी॥ १ ॥
अर्थ
हे नाथ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है, और वेद-शास्त्रों ने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शीलरहित, निरीश्वरवादी (नास्तिक) और निःशंक (निडर) हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद