धरम धुरीन धीर नय नागर
धरम धुरीन धीर नय नागर
चौपाई ३, दोहा ३०४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥ देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥ ३ ॥
अर्थ
धर्मधुरीन, धीर, नय-नागर; सत्य, स्नेह, शील और सुख के सागर; नीति और प्रीति के पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाज को देखकर,
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
श्रीराम-भरत संवाद