जासु बिलोकि भगति लवलेसू

चौपाई ३, दोहा ३०३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू॥ महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी॥ ३ ॥

अर्थ

जिनकी भक्ति का लवलेश देखकर मुनिगण और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्र हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहे? उनकी भक्ति और सुन्दर भाव से [कवि के] हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है (विकसित हो रही है)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद