दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं
चौपाई ४, दोहा ३०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं॥ लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू॥ ४ ॥
अर्थ
चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक-दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हँसकर कहने लगे—कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक (कामी पुरुष) एक-सरीखे (एक ही स्वभाव के) हैं। [पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्, युवन् और मघवन् शब्दों के रूप भी एक-सरीखे होते हैं]।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद