अस कहि प्रेम बिबस भए भारी
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी
चौपाई ३, दोहा ३०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥ प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥ ३ ॥
अर्थ
भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] का जल भर आया। अकुलाकर (व्याकुल होकर) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद