सोक कनकलोचन मति छोनी

चौपाई २, दोहा २९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी॥ भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला॥ २ ॥

अर्थ

शोक रूपी हिरण्याक्ष ने [सारी सभा की] बुद्धि रूपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूह रूपी जगत् की योनि (उत्पन्न करनेवाली) थी। भरतजी के विवेक रूपी विशाल वराह (वराहरूपधारी भगवान्) ने [शोक रूपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर] बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया!।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद