धन्य भरत जय राम गोसाईं

चौपाई १, दोहा ३०९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥ मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥ १ ॥

अर्थ

“भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजी की जय हो!” ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक (अत्यधिक) हर्षित होने लगे। भरतजी के वचन सुनकर मुनि, मिथिलेश और सभा में सब किसी को बड़ा उत्साह (आनन्द) हुआ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद