प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी

चौपाई १, दोहा २९८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥ सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥ १ ॥

अर्थ

हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद् (मित्र), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरल हृदय, श्रेष्ठ मालिक, शील के भण्डार, शरणागत की रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद