एकु मनोरथु बड़ मन माहीं
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं
चौपाई १, दोहा ३०८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥ कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥ १ ॥
अर्थ
मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता। [श्रीरामचन्द्रजी ने कहा--] हे भाई! कहो। तब प्रभु की आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद