प्रभु पद पदुम पराग दोहाई
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई
चौपाई १, दोहा ३०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥ सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥ १ ॥
अर्थ
प्रभु (आप) के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृत (पुण्य) और सुख की सुहावनी सीमा (अवधि) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय की जागते, सोते और स्वप्न में भी बनी रहनेवाली रुचि (इच्छा) कहता हूँ।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद