प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला

चौपाई २, दोहा ३०२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला॥ सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे॥ २ ॥

अर्थ

पहले तो कुमत (बुरा विचार) करके कपट को बटोरा (अनेक प्रकार के कपट का साज सजा)। फिर वह (कपटजनित) उचाट सब के सिर पर डाल दिया। फिर देवमाया से सब लोगों को विशेषरूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यन्त बिछोह नहीं हुआ (अर्थात्‌ उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद