सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को

चौपाई २, दोहा ३०४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को॥ देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥ २ ॥

अर्थ

भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम (अभागा) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त (भरतजी) के हृदय की स्थिति जानकर,

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद