भरतहि भयउ परम संतोषू

चौपाई २, दोहा ३०७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू॥ मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू॥ २ ॥

अर्थ

भरतजी को परम सन्तोष हुआ। स्वामी के सम्मुख (अनुकूल) होते ही उनके दुःख और दोषों ने मुँह मोड़ लिया (वे उन्हें छोड़कर भाग गये)। उनका मुख प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया। मानो गूँगे पर सरस्वती की कृपा हो गयी हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद