नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई

चौपाई ४, दोहा ३०० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई॥ अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी॥ ४ ॥

अर्थ

हे नाथ! मैंने स्वामी और समाज के संकोच को छोड़कर अविनय या विनयभरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है। हे देव! मेरे आर्तभाव (आतुरता) को जानकर आप क्षमा करेंगे।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद