जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू
चौपाई ४, दोहा ३०५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू॥ तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ
यदि बिना समय के (संध्या से पूर्व ही) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत् में किसको क्लेश न होगा? हे तात! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह (पिता की असामयिक मृत्यु) किया है। पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सब को बचा लिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद