सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई
चौपाई २, दोहा ३०१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥ अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥ २ ॥
अर्थ
वह रुचि है--कपट, स्वार्थ और [अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप] चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३०१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद