हियँ सुमिरी सारदा सुहाई

चौपाई ४, दोहा २९७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई॥ बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली॥ ४ ॥

अर्थ

फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया। वे मानस से (उनके मनरूपी मानसरोवर से) उनके मुखारविन्द पर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुन्दर हंसिनी [के समान गुण-दोष का विवेचन करनेवाली] है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २९७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद