भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ
चौपाई १, दोहा ३०४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥ कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥ १ ॥
अर्थ
भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। [अतः] मेरी तुच्छ बुद्धि की चञ्चलता को कविलोग क्षमा करें! भरतजी के सद्भाव को कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्त न हो जायगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।
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श्रीराम-भरत संवाद