रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं

चौपाई ४, दोहा ३०८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥ सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥ ४ ॥

अर्थ

और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [लाया हुआ] तीर्थों का जल स्थापित कर देना। प्रभु के वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद