आपु छोटि महिमा बड़ि जानी

चौपाई ४, दोहा ३०३ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी॥ कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई॥ ४ ॥

अर्थ

परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कविकुल की मर्यादा मानकर सकुचा गयी (उसका वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी)। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी (वह कुण्ठित हो गयी)।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद