बोले बचन बानि सरबसु से

चौपाई ४, दोहा ३०४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥ तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥ ४ ॥

अर्थ

[तदनुसार] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस (अमृत)-सरीखे थे। [उन्होंने कहा--] हे तात भरत! तुम धर्म की धुरी को धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “श्रीराम-भरत संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३०४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा भरत को पितृ आज्ञा, राजधर्म और समर्पण का उपदेश का वर्णन है।

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श्रीराम-भरत संवाद