श्रीरामजी का स्वागत, भरत मिलाप, सबका मिलनानंद
अयोध्या में श्रीरामजी का भव्य स्वागत होता है और भरतजी से उनका करुणामय मिलन सभी को भावविह्वल कर देता है। भाइयों, माताओं और नगरवासियों का हृदय प्रेम और आनंद से भर जाता है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण ३ / २१
प्रकरण पाठ
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥ स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥ ४ ॥
अर्थ:
भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजी ने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। [उनके] साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमल के समान नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] के जल की बाढ़ आ गयी।
राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥ प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही। जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥ १ ॥
अर्थ:
कमल के समान नेत्रों से जल बह रहा है। सुन्दर शरीर में पुलकावली [अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरतजी को अत्यन्त प्रेम से हृदय से लगाकर मिले। भाई से मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और श्रृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभा को प्राप्त हुए।
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥ २ ॥
अर्थ:
कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजी के मुख से वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजी ने कहा--] हे पार्वती ! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजी को मिल रहा था) वचन और मन से परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजी ने कहा--] हे कोसलनाथ! आपने आर्त जानकर दास को दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरह समुद्र में डूबते हुए मुझको कृपानिधान ने हाथ पकड़कर बचा लिया!
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥
अर्थ:
मानो धेनुएँ अपने बालक बछड़ों को घर में छोड़कर परवश होकर वन में चरने गई हों और दिन के अन्त में नगर की ओर मुख करके, थनों से दूध स्रवत करते हुए, हुंकार कर धावत हो गई हों। अत्यन्त प्रेम से प्रभु ने सब माताओं से भेंट की और उनसे बहुत प्रकार के मृदु वचन कहे। विषम विपत्ति और वियोगजन्य दुःख दूर हो गया; उन्होंने हर्ष और सुख के अगणित लाभ पाए।
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥ मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर [गुरुजी से कहा—] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े के समान हुए। मेरे हित के लिये इन्होंने अपना जन्म तक न्योछावर कर दिया। ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं।
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥ कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥ ३ ॥
अर्थ:
स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदय में हर्ष भरकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोने के थालों में अनेक प्रकार की आरतियाँ सजाकर शुभ गान कर रही हैं।
प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥ १ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं। [इसलिए] वे पहले उन्हीं के गृह को गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरि ने अपने भवन को गमन किया।