श्रीरामजी का स्वागत, भरत मिलाप, सबका मिलनानंद

अयोध्या में श्रीरामजी का भव्य स्वागत होता है और भरतजी से उनका करुणामय मिलन सभी को भावविह्वल कर देता है। भाइयों, माताओं और नगरवासियों का हृदय प्रेम और आनंद से भर जाता है।

उत्तरकाण्ड · प्रकरण ३ / २१

प्रकरण पाठ

चौपाई

आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा॥ बामदेव बसिष्ट मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक॥ १ ॥

अर्थ:

भरतजी के साथ सब लोग आये। श्रीरघुबीर के वियोग से सबके शरीर कृश हो रहे हैं। प्रभु ने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठों को देखा, तो उन्होंने धनुष-बाण पृथ्वी पर रखकर--.

चौपाई

धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥ भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया॥ २ ॥

अर्थ:

दौड़कर गुरु चरण सरोरुह पकड़ लिये; अनुज सहित अति पुलक तनोरुह। भेंटि कुशल बूझी मुनिराया। हमारे कुशल तुम्हारी ही दया॥

चौपाई

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥ गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज॥ ३ ॥

अर्थ:

सकल द्विजों से मिलकर मस्तक नवाया। धर्म की धुरी रघुकुलनाथा ने॥ फिर भरतजी ने प्रभु के वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शंकरजी और ब्रह्माजी नमस्कार करते हैं।

चौपाई

परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥ स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥ ४ ॥

अर्थ:

भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजी ने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। [उनके] साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमल के समान नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] के जल की बाढ़ आ गयी।

छन्द

राजीव लोचन स्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी॥ प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही। जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही॥ १ ॥

अर्थ:

कमल के समान नेत्रों से जल बह रहा है। सुन्दर शरीर में पुलकावली [अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरतजी को अत्यन्त प्रेम से हृदय से लगाकर मिले। भाई से मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कही नहीं जाती। मानो प्रेम और श्रृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभा को प्राप्त हुए।

छन्द

बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥ २ ॥

अर्थ:

कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजी के मुख से वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजी ने कहा--] हे पार्वती ! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजी को मिल रहा था) वचन और मन से परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजी ने कहा--] हे कोसलनाथ! आपने आर्त जानकर दास को दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरह समुद्र में डूबते हुए मुझको कृपानिधान ने हाथ पकड़कर बचा लिया!

दोहा

पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ। लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥ ५ ॥

अर्थ:

फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुघ्नजी को हृदय से लगाकर उनसे मिले। तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेम से मिले।

दोहा 6 के अंतर्गत
चौपाई

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥ सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥ १ ॥

अर्थ:

फिर भरत के अनुज लक्ष्मणजी से भेंट हुई। विरह से उत्पन्न दुःसह दुःख मिट गये। सीताजी के चरणों में भरतजी ने सिर नवाया। अनुज समेत परम सुख पाया।

चौपाई

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी॥ प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी॥ २ ॥

अर्थ:

प्रभु को देखकर अयोध्यावासी हर्षित हुए। वियोग से उत्पन्न सब विपत्तियाँ नष्ट हो गईं। प्रेमातुर सब लोगों को देखकर कृपालु खरारी श्रीरामजी ने कौतुक किया।

चौपाई

अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथा जोग मिले सबहि कृपाला॥ कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी॥ ३ ॥

अर्थ:

उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपों में प्रकट हो गये और सब से [एक ही साथ] यथायोग्य मिले। कृपादृष्टि से रघुवीर ने सब नर-नारियों को शोक से रहित कर दिया।

चौपाई

छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना॥ एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा॥ ४ ॥

अर्थ:

भगवान् क्षणमात्र में सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। इस प्रकार सबको सुखी करके शील और गुणों के धाम श्रीराम आगे चले।

चौपाई

कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई॥ ५ ॥

अर्थ:

कौसल्या आदि सब माताएँ दौड़ीं, मानो बछड़ों को देखकर धेनुएँ दौड़ी हों।

छन्द

जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥

अर्थ:

मानो धेनुएँ अपने बालक बछड़ों को घर में छोड़कर परवश होकर वन में चरने गई हों और दिन के अन्त में नगर की ओर मुख करके, थनों से दूध स्रवत करते हुए, हुंकार कर धावत हो गई हों। अत्यन्त प्रेम से प्रभु ने सब माताओं से भेंट की और उनसे बहुत प्रकार के मृदु वचन कहे। विषम विपत्ति और वियोगजन्य दुःख दूर हो गया; उन्होंने हर्ष और सुख के अगणित लाभ पाए।

दोहा

भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकई हृदयँ बहुत सकुचानि॥ ६ (क) ॥

अर्थ:

सुमित्राजी ने अपने पुत्र लक्ष्मणजी की श्रीरामजी के चरणों में प्रीति जानकर [श्रीरामजी से] भेंट की। श्रीरामजी से मिलते समय कैकेयीजी हृदय में बहुत सकुचायीं।

दोहा

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ॥ ६ (ख) ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी सब माताओं से मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयीजी से बार-बार मिले, पर उनके मन का क्षोभ नहीं जाता।

दोहा 7 के अंतर्गत
चौपाई

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही॥ देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता॥ १ ॥

अर्थ:

जानकीजी सब सासुओं से मिलीं और उनके चरणों में लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशीष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो।

चौपाई

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥ कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥ २ ॥

अर्थ:

सब रघुपति के मुख कमल को देख रहे हैं। मंगल जानकर नेत्रों के जल को रोक लेते हैं। कनक थाल में आरती उतारते हैं और बार-बार प्रभु के गात निहारते हैं।

चौपाई

नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥ कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥ ३ ॥

अर्थ:

अनेकों प्रकार से निछावरें करती हैं और हृदय में परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपासिंधु और रणधीर श्रीरघुवीर को देख रही हैं।

चौपाई

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥ अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥ ४ ॥

अर्थ:

वे बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंकापति रावण को कैसे मारा? मेरे ये दोनों बच्चे बहुत सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महाबली थे।

दोहा

लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु॥ ७ ॥

अर्थ:

लक्ष्मणजी और सीताजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्द में मग्र है और शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है।

दोहा 8 के अंतर्गत
चौपाई

लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला॥ हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा॥ १ ॥

अर्थ:

लंकापति विभीषण, कपीस सुग्रीव, नल, नील, जामवंत, अंगद और हनुमानजी आदि सभी बानर वीरों ने मनुष्यों के मनोहर शरीर धारण कर लिये।

चौपाई

भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा॥ देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीती॥ २ ॥

अर्थ:

वे सब भरतजी के स्नेह, शील, व्रत और नेमों की अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। नगरवासियों की रीति देखकर वे सब प्रभु के चरणों के प्रति प्रीति की सराहना कर रहे हैं।

चौपाई

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए॥ गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरघुनाथजी ने सब सखाओं को बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वसिष्ठजी हमारे कुल के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रण में राक्षस मारे गये हैं।

चौपाई

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे॥ मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर [गुरुजी से कहा—] हे मुनि! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े के समान हुए। मेरे हित के लिये इन्होंने अपना जन्म तक न्योछावर कर दिया। ये मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं।

चौपाई

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए॥ ५ ॥

अर्थ:

प्रभु के वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में मग्र हो गये। इस प्रकार पल-पल में उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं।

दोहा

कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥ ८ (क) ॥

अर्थ:

फिर उन लोगों ने कौसल्याजी के चरणों में मस्तक नवाये। कौसल्याजी ने हर्षित होकर आशीष दीं [और कहा—] तुम मुझे रघुनाथ के समान प्रिय हो।

दोहा

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद॥ ८ (ख) ॥

अर्थ:

आकाश में फूलों की वृष्टि से सब भर गया। सुखकंद श्रीरामजी भवन को चले। नगर के स्त्री-पुरुषों का समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहा है।

दोहा 9 के अंतर्गत
चौपाई

कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥ बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥ १ ॥

अर्थ:

सोने के कलशों को विचित्र रीति से [मणि-रत्नादि से] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगों ने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगों ने मंगल के लिए बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं।

चौपाई

बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं॥ नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे॥ २ ॥

अर्थ:

सारी गलियाँ सुगन्धित द्रव्यों से सिंचायी गयीं। गजमणियों से रचकर बहुत-से चौक पुराये गये। अनेकों प्रकार के सुमंगल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगर में बहुत-से निसान बजे।

चौपाई

जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥ कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥ ३ ॥

अर्थ:

स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदय में हर्ष भरकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोने के थालों में अनेक प्रकार की आरतियाँ सजाकर शुभ गान कर रही हैं।

चौपाई

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें॥ पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना॥ ४ ॥

अर्थ:

वे आरतिहर (दुःखों को हरनेवाले) और रघुकुलरूपी कमलवन के सूर्य श्रीरामजी की आरती कर रही हैं। नगर की शोभा, संपत्ति और कल्याण का वेद, शेषजी और सरस्वतीजी वर्णन करते हैं।

चौपाई

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं)। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणों को कैसे कह सकते हैं।

दोहा

नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥ ९ (क) ॥

अर्थ:

स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजी का विरह सूर्य है। [इस विरह-सूर्य के ताप से वे मुरझा गयी थीं।] अब उस विरहरूपी सूर्य के अस्त होने पर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्र को निरखकर वे खिल उठीं।

दोहा

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान॥ ९ (ख) ॥

अर्थ:

अनेक प्रकार के शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे हैं। नगर के पुरुषों और स्त्रियों को सनाथ (दर्शन द्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महल को चले।

दोहा 10 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं। [इसलिए] वे पहले उन्हीं के गृह को गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरि ने अपने भवन को गमन किया।

चौपाई

कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए॥ गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई॥ २ ॥

अर्थ:

कृपासिंधु श्रीरामजी जब अपने महल को गये, तब नगर के स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए। गुरु वसिष्ठ जी ने ब्राह्मणों को बुला लिया [और कहा--] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं।

चौपाई

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन॥ मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए॥ ३ ॥

अर्थ:

आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासन पर विराजमान हों। वसिष्ठ मुनि के सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणों को बहुत ही अच्छे लगे।

चौपाई

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥ अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै॥ ४ ॥

अर्थ:

वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजी का अभिषेक सम्पूर्ण जगत् को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराज का तिलक शीघ्र कीजिये।

दोहा

तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ॥ १० (क) ॥

अर्थ:

तब मुनि ने सुमन्त्र जी से कहा, वे सुनते ही हर्षित होकर चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये।

दोहा

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख) ॥

अर्थ:

और जहाँ-तहाँ दूतों को भेजकर मंगल द्रव्य मँगाकर फिर हर्ष के साथ आकर वसिष्ठ जी के चरणों में सिर नवाया।

दोहा 11 के अंतर्गत
चौपाई

अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥ राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई॥ १ ॥

अर्थ:

अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी। देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी। श्रीरामचन्द्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ।

चौपाई

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥ पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे॥ २ ॥

अर्थ:

भगवान् के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया।

चौपाई

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई॥ भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई॥ ३ ॥

अर्थ:

तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया। भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन शेषजी करोड़ों बार भी नहीं कर सकते।

चौपाई

पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥ करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामजी ने अपनी जटाएँ खोल दीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये।

दोहा

सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ। दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ॥ ११ (क) ॥

अर्थ:

[इधर] सासुओं ने जानकीजी को आदर के साथ तुरंत ही स्नान कराकर उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये (पहना दिये)।

दोहा

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि। देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि॥ ११ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीराम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान रमा (श्रीजानकीजी) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म सफल समझकर हर्षित हुईं।

दोहा

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद॥ ११ (ग) ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] हे पक्षिराज गरुड़जी! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानों पर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान् के दर्शन करने के लिये आये।