कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका
चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका॥ अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै॥ ४ ॥
अर्थ
वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजी का अभिषेक सम्पूर्ण जगत् को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराज का तिलक शीघ्र कीजिये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप