भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे

चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे॥ सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥ १ ॥

अर्थ

फिर भरत के अनुज लक्ष्मणजी से भेंट हुई। विरह से उत्पन्न दुःसह दुःख मिट गये। सीताजी के चरणों में भरतजी ने सिर नवाया। अनुज समेत परम सुख पाया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप