जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ

छन्द, दोहा ६ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

छन्द पाठ

जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख स्रवत थन हुंकार करि धावत भईं॥ अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥

अर्थ

मानो धेनुएँ अपने बालक बछड़ों को घर में छोड़कर परवश होकर वन में चरने गई हों और दिन के अन्त में नगर की ओर मुख करके, थनों से दूध स्रवत करते हुए, हुंकार कर धावत हो गई हों। अत्यन्त प्रेम से प्रभु ने सब माताओं से भेंट की और उनसे बहुत प्रकार के मृदु वचन कहे। विषम विपत्ति और वियोगजन्य दुःख दूर हो गया; उन्होंने हर्ष और सुख के अगणित लाभ पाए।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का छन्द, दोहा ६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप