तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं
चौपाई ५, दोहा ९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं॥ ५ ॥
अर्थ
परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं)। [शिवजी कहते हैं--] हे उमा! तब भला मनुष्य उनके गुणों को कैसे कह सकते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप