कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ

दोहा ८ (क) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ॥ ८ (क) ॥

अर्थ

फिर उन लोगों ने कौसल्याजी के चरणों में मस्तक नवाये। कौसल्याजी ने हर्षित होकर आशीष दीं [और कहा—] तुम मुझे रघुनाथ के समान प्रिय हो।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का दोहा ८ (क) है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप