नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह
दोहा ९ (क) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस॥ ९ (क) ॥
अर्थ
स्त्रियाँ कुमुदिनी हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजी का विरह सूर्य है। [इस विरह-सूर्य के ताप से वे मुरझा गयी थीं।] अब उस विरहरूपी सूर्य के अस्त होने पर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्र को निरखकर वे खिल उठीं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का दोहा ९ (क) है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप