भरत विरह तथा भरत-हनुमान मिलन, अयोध्या में आनंद
श्रीरामजी के वियोग में भरतजी अत्यंत व्याकुल हैं। हनुमानजी शुभ समाचार लेकर आते हैं, और उनके वचनों से अयोध्या आनंद से भर उठती है।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण २ / २१
प्रकरण पाठ
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी॥ कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा॥ २ ॥
अर्थ:
अहा! लक्ष्मण बड़े धन्य और बड़भागी हैं, जो श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविन्द के अनुरागी हैं (अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभु ने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसीसे नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया!
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी॥ जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें, तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पों तक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता। [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवक के अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभाव के हैं।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई॥ बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना॥ ४ ॥
अर्थ:
अतएव मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जाने पर यदि मेरे प्राण रह गये, तो जगत में मेरे समान अधम कौन होगा?
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ॥ मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी॥ १ ॥
अर्थ:
उन्हें देखते ही हनुमानजी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बरसने लगा। मन में बहुत प्रकार से सुख मानकर वे कानों के लिए अमृत के समान वाणी बोले--।
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती॥ रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता॥ २ ॥
अर्थ:
जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण-समूहों की पंक्तियों को आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देने वाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये।
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत॥ सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा॥ ३ ॥
अर्थ:
शत्रु को रण में जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गा रहे हैं। ये वचन सुनते ही [भरतजी को] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यास के दुःख को भूल जाय।
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए॥ मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना॥ ४ ॥
अर्थ:
हे तात! तुम कौन हो? और कहाँ से आये हो, [जो] तुमने मुझे [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देनेवाले) वचन सुनाये। [हनुमानजी ने कहा--] हे कृपानिधान! सुनिये, मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान है।
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर॥ मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्रवत जल पुलकित गाता॥ ५ ॥
अर्थ:
मैं दीनों के बन्धु श्रीरघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमानजी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। नेत्रों से [आनन्द और प्रेम के आँसुओं का] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया।
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते॥ बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता॥ ६ ॥
अर्थ:
हे हनुमानजी! तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखों का अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूप में] आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गये। भरतजी ने बार-बार कुशल पूछी [और कहा--] हे भाई! सुनो, [इस शुभ संवाद के बदले में] तुम्हें क्या दूँ?
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं॥ नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही॥ ७ ॥
अर्थ:
इस सन्देश के समान (इसके बदले में देने लायक पदार्थ) जगत में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिए] हे तात! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभु का चरित्र (हाल) सुनाओ।
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा॥ कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं॥ ८ ॥
अर्थ:
हनुमानजी ने भरतजी के चरणों में मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजी की सारी गुणगाथा कही। [भरतजी ने पूछा--] हे हनुमानजी! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं?
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर्यो। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो॥ रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो॥
अर्थ:
रघुवंश के भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दास की भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं? भरतजी के अत्यन्त विनीत वचन सुनकर हनुमानजी पुलकित शरीर होकर उनके चरणों पर गिर पड़े [और मन में विचारने लगे कि] जो चराचर के स्वामी हैं, वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुख से जिनके गुणसमूहों का वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों?
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं॥ एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई॥ ४ ॥
अर्थ:
जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशा में) वे वैसे ही (वहीं से उसी दशा में) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जाने के डर से] बालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरे से पूछते हैं--भाई ! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजी को देखा है ?।
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर॥ सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा॥ १ ॥
अर्थ:
यहाँ (विमान पर से) सूर्यकुलरूपी कमल के प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरों को मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [वे कहते हैं--] हे सुग्रीव! हे अंगद! हे लंकापति विभीषण ! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है।
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥ जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥ ३ ॥
अर्थ:
यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में [जीवों को] पवित्र करनेवाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं।
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी॥ हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी॥ ४ ॥
अर्थ:
यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधाम को देनेवाली है। प्रभु की वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवध की स्वयं श्रीरामजी ने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है।
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु। प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु॥ ४ (ख) ॥
अर्थ:
विमान से उतरकर प्रभु ने पुष्पक विमान से कहा कि तुम अब कुबेर के पास जाओ। श्रीरामजी की प्रेरणा से वह चला; उसे [अपने स्वामी के पास जाने का] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी से अलग होने का अत्यन्त दुःख भी।