पुनि निज जटा राम बिबराए
पुनि निज जटा राम बिबराए
चौपाई ४, दोहा ११ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए॥ करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे॥ ४ ॥
अर्थ
फिर श्रीरामजी ने अपनी जटाएँ खोल दीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया। स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप