परे भूमि नहिं उठत उठाए
परे भूमि नहिं उठत उठाए
चौपाई ४, दोहा ५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए॥ स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े॥ ४ ॥
अर्थ
भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजी ने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। [उनके] साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमल के समान नेत्रों में [प्रेमाश्रुओं] के जल की बाढ़ आ गयी।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप