जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं
चौपाई ३, दोहा ९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जहँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं॥ कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं सजें करहिं सुभ गाना॥ ३ ॥
अर्थ
स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही हैं, और हृदय में हर्ष भरकर आशीर्वाद देती हैं। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोने के थालों में अनेक प्रकार की आरतियाँ सजाकर शुभ गान कर रही हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप