बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि
छन्द २, दोहा ५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
छन्द पाठ
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥ अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥ २ ॥
अर्थ
कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजी के मुख से वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजी ने कहा--] हे पार्वती ! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजी को मिल रहा था) वचन और मन से परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजी ने कहा--] हे कोसलनाथ! आपने आर्त जानकर दास को दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरह समुद्र में डूबते हुए मुझको कृपानिधान ने हाथ पकड़कर बचा लिया!
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का छन्द २, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।