नाना भाँति निछावरि करहीं
नाना भाँति निछावरि करहीं
चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं॥ कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि॥ ३ ॥
अर्थ
अनेकों प्रकार से निछावरें करती हैं और हृदय में परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपासिंधु और रणधीर श्रीरघुवीर को देख रही हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप