प्रभु जानी कैकई लजानी

चौपाई १, दोहा १० के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी॥ ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ

[शिवजी कहते हैं--] हे भवानी! प्रभु ने जान लिया कि माता कैकेयी लज्जित हो गयी हैं। [इसलिए] वे पहले उन्हीं के गृह को गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरि ने अपने भवन को गमन किया।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप