कंचन कलस बिचित्र सँवारे
कंचन कलस बिचित्र सँवारे
चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे॥ बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू॥ १ ॥
अर्थ
सोने के कलशों को विचित्र रीति से [मणि-रत्नादि से] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगों ने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगों ने मंगल के लिए बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप