राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
श्रीरामजी का दिव्य राज्याभिषेक संपन्न होता है। इस पावन अवसर पर वेद और शिवजी प्रभु की महिमा का गान करते हैं।
उत्तरकाण्ड · प्रकरण ४ / २१
प्रकरण पाठ
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा॥ रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु को देखकर मुनि वसिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान था। उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उस पर विराज गये।
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई॥ बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीजानकीजी के सहित श्रीरघुनाथजी को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणों ने वेदमन्त्रों का उच्चारण किया। आकाश में देवता और मुनि “जय हो, जय हो” ऐसी पुकार करने लगे।
बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे॥ सिंघासन पर त्रिभुअन साईं। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं॥ ४ ॥
अर्थ:
उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिये और सम्पूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। त्रिभुवन के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को सिंहासन पर देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाये।
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं॥ भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥ १ ॥
अर्थ:
आकाश में बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराओं के झुंड नाच रहे हैं। देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं। भरतादि अनुज, विभीषण, अंगद, हनुमान आदि समेत छत्र, चँवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिये हुए सुशोभित हैं।
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई॥ मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीसीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्रीरामजी के शरीर में अनेकों कामदेवों की छवि शोभा दे रही है। नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुन्दर श्याम शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को भी मोहित कर रहा है। मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए हैं। कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं; जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं।
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुजबल हने॥ अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे। जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे॥ १ ॥
अर्थ:
हे सगुण और निर्गुण रूप! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त! हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी)-सहित शक्तिमान आपको नमस्कार करता हूँ।
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे॥ जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे॥ २ ॥
अर्थ:
हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और जड़-जगत सभी काल, कर्म और गुणों से भरे हुए दिन-रात अनन्त भव के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ! जिन पर आपने कृपा करके दृष्टि डाली, वे तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गये। हे जन्म-मरण के श्रम को नष्ट करने में कुशल श्रीरामजी! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं।
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी॥ बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे॥ ३ ॥
अर्थ:
जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु के भय को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देवदुर्लभ पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं। [परन्तु] जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं।
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी॥ ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे॥ ४ ॥
अर्थ:
जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर [शिला बनी हुई] गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली सुरसरिता गंगा निकलीं और ध्वजा, वज्र, अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे लगने से चिह्न पड़ गये हैं; हे मुकुन्द! हे राम! हे रमेश! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं।
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने॥ फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे॥ ५ ॥
अर्थ:
वेद-शास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है; जो [प्रवाहरूप से] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ, छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत-से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं; जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसार-वृक्षस्वरूप (विश्वरूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं।
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मन पर ध्यावहीं। ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं॥ करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं॥ ६ ॥
अर्थ:
ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है—जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणा के धाम प्रभो! हे सद्गुणों की खान! हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें।
जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं॥ अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो॥ १ ॥
अर्थ:
हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकान्त)! हे जन्म-मरण के संताप का नाश करनेवाले! आपकी जय हो; भवताप और भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिये। हे अवधपति! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिये।
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा॥ रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे॥ २ ॥
अर्थ:
हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करनेवाले श्रीरामजी! राक्षस-समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाणरूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गये।
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए॥ हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे॥ ४ ॥
अर्थ:
कामदेवरूपी भील ने मनुष्यरूपी हिरनों के हृदय में कुभोगरूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। हे नाथ! हे [पाप-ताप का हरण करनेवाले] हरे! उसे मारकर विषयरूपी वन में भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिये।
नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा॥ एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा॥ ७ ॥
अर्थ:
उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मान है, न मद। उनके लिये सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है। इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे॥ तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी॥ ९ ॥
अर्थ:
हे मुनियों के मनरूपी कमल के भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)। हे हरि! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरणरूपी रोग की महान् औषध और अभिमान के शत्रु हैं।
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं॥ रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीनजनं॥ १० ॥
अर्थ:
आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन! [आप जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेषादि] द्वन्द्व-समूहों का नाश कीजिये। हे पृथ्वी की पालना करनेवाले राजन्! इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिये।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी॥ महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका॥ १ ॥
अर्थ:
हे गरुड़जी! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकार के तापों और जन्म-मृत्यु के भय का नाश करनेवाली है। महाराज श्रीरामचन्द्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र [निष्कामभाव से] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं।
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं॥ सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं॥ २ ॥
अर्थ:
और जो मनुष्य सकाम भाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेक प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अन्तकाल में श्रीरघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं।
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई॥ खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी॥ ३ ॥
अर्थ:
इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमशः] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। हे पक्षिराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरण के] भय और दुःख को हरनेवाली है।
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज॥ मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए॥ ५ ॥
अर्थ:
श्रीरामजी के चरणकमलों में—जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं—सब की नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुकों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाये गये और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाये।