सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा

चौपाई ३, दोहा ५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा॥ गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज॥ ३ ॥

अर्थ

सकल द्विजों से मिलकर मस्तक नवाया। धर्म की धुरी रघुकुलनाथा ने॥ फिर भरतजी ने प्रभु के वे चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शंकरजी और ब्रह्माजी नमस्कार करते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप