धाइ धरे गुर चरन सरोरुह
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह
चौपाई २, दोहा ५ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह॥ भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया॥ २ ॥
अर्थ
दौड़कर गुरु चरण सरोरुह पकड़ लिये; अनुज सहित अति पुलक तनोरुह। भेंटि कुशल बूझी मुनिराया। हमारे कुशल तुम्हारी ही दया॥
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।
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राम का स्वागत, भरत मिलाप