सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं

चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं॥ कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं॥ २ ॥

अर्थ

सब रघुपति के मुख कमल को देख रहे हैं। मंगल जानकर नेत्रों के जल को रोक लेते हैं। कनक थाल में आरती उतारते हैं और बार-बार प्रभु के गात निहारते हैं।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “राम का स्वागत, भरत मिलाप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अयोध्या में श्रीराम के स्वागत और भरत मिलाप के आनंदमय प्रसंग का वर्णन है।

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राम का स्वागत, भरत मिलाप